हिन्दू मुस्लिम एकता मतलब।
मुँह में राम बगल में छुरी वाली कहावत है। कभी एक नहीं हो सकते। मुस्लिमों ने बहुत घाव दिए हैं, इसलिये कभी यकीन नहीं करता कोई। कभी भी धोखा दे सकते हैं। ऐसा सभी हिन्दू सोचते हैं। इसका कारण भी है कि पढा लिखा मुस्लिम कभी अपनी समाज की जाहिलियत का, आतंकवाद का, पाकिस्तान बनने के पहले से, कई सैकड़ों साल से अब तक भारत का हिस्सा नहीं हो पाए। जबकि 2 हिस्से करवा दिए फिर भी यंही रुक गए। यंहा वो सब मिला जो वँहा या किसी मुस्लिम देश मे नहीं मिलता। मैंने कई मुस्लिम दोस्तों से ये बात रखी और पूँछी है, जो जाहिल से लेकर Engg, Dr, Prof. भी हैं पर बहुत कम ही पर फिर भी कोई अपनी समाज की कमियों की बुराई नहीं करता। जबकि हिन्दू कई हैं जिनमें मैं खुद बुरे को बुरे बोलने में संकोच नहीं करता। लोगों की जल जलती है। पर सच है।
और जो मुस्लिम करते भी हैं तो उनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया जाता है। सलमान रुश्दी और तसलीमा ऐसे उदाहरण हैं।
हम हिन्दू कुरीतियों की जम कर आलोचना करते हैं यदि गलत है तो है तभी तो सुधार होगा। पढ़े लिखे मुस्लिम हमेशा ऐसे समय उदारवाद का सहारा लेते हैं जबकि उन्हें एक अच्छे नेता बनकर अपनी समाज को देशहित में लगाना चाहिये।
मुस्लिम को शक की निगाह से कयूं देखा जाता है क्योंकि इनके ऐसे काम रहे हैं।
जब तक ये और इनके नेता देश हित मे नहीं खड़े होंगे तब तक ये खाई बानी रहेगी।
और हिन्दू अभी तक डरे सहमे रहते थे पर अब उन्हें भी नया नेता या कहिए नया काज़ी मिल चुका है जो हिंदू में दबे हुए गुस्से को बार बार परख रहा है। किसी अंतिम लड़ाई के लिये। उन्हें और कुछ आता ही नहीं है। इनका इतना प्रभावशील होने का कारण मुस्लिम के प्रति हिन्दू का रोष है, गुस्सा है।
अब गुस्सा कौन सा !!! आजादी के पहले, आजादी के बाद, कश्मीर पंडित, आतंकवाद और अब तक के दंगे फसाद में मारे गए हिन्दू के लिये और देश के प्रति इनकी दोधारी सोच के लिये।
इस गुस्से का उपयोग देश हित की जगह मुस्लिम धर्म के विरुद्ध हो रहा है और जायज भी है क्योंकि मुस्लिमों ने कभी इन सब कांड के लिये माफी नहीं मांगी, जबकि जलियावाला कांड के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री और उनकी रानी माफी मांग चुके हैं।
तो भाईजान कोमी एकता सिर्फ एक दिखावा है, भारत मे हम सब धर्मान्धता के एटम बम पर बैठे हैं, पहले तैयार नहीं थे, अब सब तैयार हैं।
दिल्ली दंगा सिर्फ एक प्रयोग था। ये सभी एक प्रयोग ही हो रहे हैं समाज मे। और ये सभी प्रयोग रोके जा सकते थे पर रुके नहीं, क्योंकि सियासत में और शतरंज में कुछ मोहरे मारकर ही जीत हासिल की जाती है।
हालांकि ये मोहरे हमेशा पैदल जैंसे गरीब ही होते हैं और हा कुछ बड़े सिपहसलार भी कुर्बान किये जाते हैं। बीजेपी जैंसी पार्टी बनी ही है सिर्फ हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों के कारण बांकी सभी तो बातें गौण हैं इनकी।
दुख सिर्फ इस बात का है इसमें भारत का नुकसान हो रहा है। इसलिए मैंने जितना हो सका उतनी बात साफ स्पस्ट कर दी।
अंत मे इनके लोकल नेता मौलवी धर्म गुरु इन्हें देश हित छोड़कर सिर्फ धर्म की घुट्टी पिलाते रहते हैं। जिसके कारण ये मिलते भी हैं तो नमक की तरह खारापन लिये जिसके कारण ही देशभक्ति इनके लिये दूर की कौंड़ी हैं।
इन्हें वैश्विक नेता नहीं तो कम से कम राष्ट्रीय नेता की जरूरत है जो धर्म से परे देश के लिये सोचे। एक थे कलाम साहब पर वो जो कुछ देश के लिये कर गए उसका कोई मूल्य नहीं है। पर मुस्लिम कौम में नहीं तैयार कर पाए अपने जैंसे और कलाम। कलाम का विजन 2020 में शायद ये अध्याय रह गया।
अब भी मानवतावादी होने के नाते सभी 25 करोड़ मुस्लिम यदि एक सूत्र में बंधकर देश के लिये सोचने लगे तो देश 1 साल में ही विश्वगुरु बन जायेगा वरना सपना ही रहेगा क्योंकि टँकी की तली में एक भी छेद कभी उसे पूरा नहीं भरने देगा।
और ऐसे भारत की कल्पना भगत बोस आजाद ने न की होगी।
मुँह में राम बगल में छुरी वाली कहावत है। कभी एक नहीं हो सकते। मुस्लिमों ने बहुत घाव दिए हैं, इसलिये कभी यकीन नहीं करता कोई। कभी भी धोखा दे सकते हैं। ऐसा सभी हिन्दू सोचते हैं। इसका कारण भी है कि पढा लिखा मुस्लिम कभी अपनी समाज की जाहिलियत का, आतंकवाद का, पाकिस्तान बनने के पहले से, कई सैकड़ों साल से अब तक भारत का हिस्सा नहीं हो पाए। जबकि 2 हिस्से करवा दिए फिर भी यंही रुक गए। यंहा वो सब मिला जो वँहा या किसी मुस्लिम देश मे नहीं मिलता। मैंने कई मुस्लिम दोस्तों से ये बात रखी और पूँछी है, जो जाहिल से लेकर Engg, Dr, Prof. भी हैं पर बहुत कम ही पर फिर भी कोई अपनी समाज की कमियों की बुराई नहीं करता। जबकि हिन्दू कई हैं जिनमें मैं खुद बुरे को बुरे बोलने में संकोच नहीं करता। लोगों की जल जलती है। पर सच है।
और जो मुस्लिम करते भी हैं तो उनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया जाता है। सलमान रुश्दी और तसलीमा ऐसे उदाहरण हैं।
हम हिन्दू कुरीतियों की जम कर आलोचना करते हैं यदि गलत है तो है तभी तो सुधार होगा। पढ़े लिखे मुस्लिम हमेशा ऐसे समय उदारवाद का सहारा लेते हैं जबकि उन्हें एक अच्छे नेता बनकर अपनी समाज को देशहित में लगाना चाहिये।
मुस्लिम को शक की निगाह से कयूं देखा जाता है क्योंकि इनके ऐसे काम रहे हैं।
जब तक ये और इनके नेता देश हित मे नहीं खड़े होंगे तब तक ये खाई बानी रहेगी।
और हिन्दू अभी तक डरे सहमे रहते थे पर अब उन्हें भी नया नेता या कहिए नया काज़ी मिल चुका है जो हिंदू में दबे हुए गुस्से को बार बार परख रहा है। किसी अंतिम लड़ाई के लिये। उन्हें और कुछ आता ही नहीं है। इनका इतना प्रभावशील होने का कारण मुस्लिम के प्रति हिन्दू का रोष है, गुस्सा है।
अब गुस्सा कौन सा !!! आजादी के पहले, आजादी के बाद, कश्मीर पंडित, आतंकवाद और अब तक के दंगे फसाद में मारे गए हिन्दू के लिये और देश के प्रति इनकी दोधारी सोच के लिये।
इस गुस्से का उपयोग देश हित की जगह मुस्लिम धर्म के विरुद्ध हो रहा है और जायज भी है क्योंकि मुस्लिमों ने कभी इन सब कांड के लिये माफी नहीं मांगी, जबकि जलियावाला कांड के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री और उनकी रानी माफी मांग चुके हैं।
तो भाईजान कोमी एकता सिर्फ एक दिखावा है, भारत मे हम सब धर्मान्धता के एटम बम पर बैठे हैं, पहले तैयार नहीं थे, अब सब तैयार हैं।
दिल्ली दंगा सिर्फ एक प्रयोग था। ये सभी एक प्रयोग ही हो रहे हैं समाज मे। और ये सभी प्रयोग रोके जा सकते थे पर रुके नहीं, क्योंकि सियासत में और शतरंज में कुछ मोहरे मारकर ही जीत हासिल की जाती है।
हालांकि ये मोहरे हमेशा पैदल जैंसे गरीब ही होते हैं और हा कुछ बड़े सिपहसलार भी कुर्बान किये जाते हैं। बीजेपी जैंसी पार्टी बनी ही है सिर्फ हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों के कारण बांकी सभी तो बातें गौण हैं इनकी।
दुख सिर्फ इस बात का है इसमें भारत का नुकसान हो रहा है। इसलिए मैंने जितना हो सका उतनी बात साफ स्पस्ट कर दी।
अंत मे इनके लोकल नेता मौलवी धर्म गुरु इन्हें देश हित छोड़कर सिर्फ धर्म की घुट्टी पिलाते रहते हैं। जिसके कारण ये मिलते भी हैं तो नमक की तरह खारापन लिये जिसके कारण ही देशभक्ति इनके लिये दूर की कौंड़ी हैं।
इन्हें वैश्विक नेता नहीं तो कम से कम राष्ट्रीय नेता की जरूरत है जो धर्म से परे देश के लिये सोचे। एक थे कलाम साहब पर वो जो कुछ देश के लिये कर गए उसका कोई मूल्य नहीं है। पर मुस्लिम कौम में नहीं तैयार कर पाए अपने जैंसे और कलाम। कलाम का विजन 2020 में शायद ये अध्याय रह गया।
अब भी मानवतावादी होने के नाते सभी 25 करोड़ मुस्लिम यदि एक सूत्र में बंधकर देश के लिये सोचने लगे तो देश 1 साल में ही विश्वगुरु बन जायेगा वरना सपना ही रहेगा क्योंकि टँकी की तली में एक भी छेद कभी उसे पूरा नहीं भरने देगा।
और ऐसे भारत की कल्पना भगत बोस आजाद ने न की होगी।
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